संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्षितिज के पार जाना है

क्षितिज के पार जाना है  हां,मुझे अब क्षितिज के पार जाना है, कितना उड़ सकती हूं मैं , अब ये मुझको आजमाना है। सौलह श्रृंगार, सदियों किए मैंने, शिक्षा को सत्रहवां श्रृंगार बनाना है, हां, अब मुझे क्षितिज के पार जाना है। नारी जो शक्ति स्वरूपा थीं सदियों से, क्यों बंधी रूढ़ियों में, क्यों जकड़ी बेड़ियों में, ये पता अब मुझे लगाना है, हां अब मुझे क्षितिज के पार जाना है। कोमल मन और कोमल तन, जो दिया, नारी को ईश्वर ने, नहीं कमजोर दिए निश्चय, यही सबको दिखाना है, हां, अब मुझे क्षितिज के पार जाना है। लाचार नहीं हूं मैं,मन मेरा कोमल है , संकल्प है ये मेरा, सुंदर संसार बसाना है, कुछ झुककर, कुछ उठकर, परिवार चलाना है, अबला नहीं हूं मैं,बस ये बतलाना है। हां, अब मुझे क्षितिज के पार जाना है। श्रृंगार नहीं सौलह, शिक्षा श्रृंगार सत्रहवां है, सत्रहवें श्रृंगार से अब खुद को सजाना है, सम्मान के बदले में, सम्मान ही पाना है, हां, अब मुझे क्षितिज के पार जाना है। कंचन चौहान, बीकानेर 

बस तूं अपने ख्वाब बुन

चल अब फिर से तूं ख्वाब बुन, ना औरों की तूं बात सुन, खुद पर बस विश्वास कर। इक नयी डगर पर आज चल, और नये सफर का आगाज कर। ना औरों पर तूं ध्यान धर, अपनी मंजिल तूं आप चुन, हां, खुद पर बस विश्वास कर। कुछ रोकेंगे, कुछ टोकेंगे, कुछ तुझे हौसला भी देंगे , भांति - भांति लोग मिले , ना कर तूं किसी से शिकवे गिले। सब कुछ जीवन का हिस्सा है, ये हर प्राणी का किस्सा है। बस तूं मंजिल पर ध्यान धर, ना भटका मन तूं इधर उधर। जिस दिन मंजिल को पायेगा, तेरा जीवन सफ़ल हो जायेगा। तूं कब हारा था,कब टूटा था, ये किसी को याद ना आएगा। तेरी कामयाबी के जश्न में, हर कोई तुझे, गले लगायेगा। लेकिन जो हार के बैठ गया, दुनिया की भीड़ में खो जायेगा। तूं कब आया था,कब गया, ये किसी को याद ना आएगा। चल फिर से तूं ख्वाब बुन, हिम्मत को अपना साथी चुन। तेरा जज्बा,तेरा हौसला, तेरी पहचान बन जायेगा। जब हार नहीं मानेगा तूं, और खुद को खुद पहचानेगा, मंजिल भी रस्ता निहारेंगी, तेरे ख्वाबों को सच करने को, कायनात शिद्दत से तुझे पुकारेगी। माना जिंदगानी खेल नहीं केवल, हर क़द...