मन का डर 💔
मन का ये डर मन से जाता ही नहीं, मन बेचैन है, चैन आता ही नहीं। 😔 जाने कब पड़ जाए करना भुगतान किसी और की गलती का दंड। सही होकर भी सज़ा मिले अगर, तो जाऊँ कहाँ गुहार लगाने? रास्ता अब कोई नज़र आता ही नहीं। 🥀 सोचती हूँ — न्याय अगर मिल भी जाए, तो भी नहीं लौट पाएगा साहिल; न मिल सकेगा सुकून माँ को, न फिर से सजेगा वो उजड़ा चमन। 🌼 एहतियात बरतनी थी समय रहते, कहाँ थी कमी, कहाँ चूके हम? नहीं साँसें बिकती आज भी बाज़ारों में, माँ की आँखें ढूँढती हैं बेटे को हज़ारों में। 👀 नहीं रख सकते बाँधकर घरों में हम, भेजना तो पड़ेगा जान से प्यारों को। ❤️ घर होता है शिक्षा का मंदिर, शिक्षा घर से ही दे दो। 📚 अपनी मस्ती के चक्कर में, जान न जोखिम में डालो। ⚠️ जीवन एक अमूल्य धन है — जियो और फिर जीने दो। 🌿 घर से चूक अगर हो जाए, दंड इसका क्यों दुनिया चुकाए? सुरक्षा की व्यवस्था कर दो गलियों और बाज़ारों में। 🚦 मेरे मन के इस डर को मन से ही मिट जाने दो। न गलती करे कभी कोई, चैन से सबको जीने दो। 🕊️ बेचैन इस बेबस मन को चैन की नींद सो जाने दो। 🌙 — कंचन चौहान बीकानेर ✍️