मां
वही घर है, वही रिश्ते हैं,
वही अपनापन है घर में ।
लेकिन बस मां के जाने से,
भर गया सूनापन है मन में।
मां होती तो कहती मुझसे,
बेटा राखी पर घर आ जाना,
अगर नहीं आओ तुम तो फिर,
राखी वक्त पर भिजवा देना।
सावन की हरियाली तीज पर,
चूड़ी चूंदड़ी या फिर लहरिया,,
जो चाहे तुम ले लेना।
सज संवर कर रहना लाडो,
व्यर्थ की चिंता मत करना।
मां नहीं है,बस मां की अब यादें हैं,
मां होती तो ऐसा होता,
मां होती तो वैसा होता,
ये बस केवल बातें हैं।
वक्त नहीं रुकता जीवन में,
वक्त गुजरता जाता है ,
मां का दर्जा क्या होता है,
क्यों मां ममता की मूरत कहलाती है।
मां की अहमियत इस जीवन में,
मां के जाने के बाद समझ में आती है।
वो घर,वो गलियां और वो रिश्ते,
सब वैसे के वैसे हैं,
बस मां के ना होने से,
अब अंजाने से लगते हैं।
सब वैसे के वैसे हैं,
फिर भी बेगाने लगते हैं।
कंचन चौहान, बीकानेर
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