शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का प्रसिद्ध उपन्यास "बड़ी दीदी "
बड़ी दीदी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यासों में से एक है। अपने बचपन की मित्र धीरू की मधुर स्मृतियाँ लेखक के मानस पटल पर लंबे समय तक अंकित रहीं। इन्हीं स्मृतियों के आधार पर उन्होंने देवदास की पारो, श्रीकांत की राजलक्ष्मी और बड़ी दीदी की माधवी जैसे अमर पात्रों की रचना की। यह उपन्यास 1913 में लिखा गया था, जिस पर बाद में फिल्म भी बनाई गई। बड़ी दीदी मूलतः जमींदार सुरेंद्रनाथ के बचपन से लेकर जीवन के अंत तक की करुण कथा है। सुरेंद्रनाथ की माता का देहांत उसके बचपन में ही हो गया था। विमाता ने उसका पालन-पोषण इस प्रकार किया कि वह अपनी मूलभूत आवश्यकताओं—भूख, प्यास, नींद—तक को समझने में असमर्थ रह गया। फिर भी किसी प्रकार उसने विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, जो उस समय एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। मित्रों की प्रेरणा से उसने विलायत जाने की इच्छा प्रकट की, किंतु विमाता के हस्तक्षेप के कारण पिता ने अनुमति नहीं दी। इससे क्षुब्ध होकर सुरेंद्रनाथ एक रात घर छोड़कर कोलकाता चला गया। परिस्थितियाँ उसे माधवी के पिता के घर ले आती हैं। माधवी, जो मात्र सोलह वर्ष की विधवा है, प...