मुंशी प्रेमचंद की कालजई रचना 'निर्मला'
निर्मला – एक स्त्री के मौन दुःख, टूटते विश्वास और बिखरते परिवार की करुण गाथा
— कंचन चौहान
प्रेमचंद का उपन्यास ‘निर्मला’ हिंदी साहित्य की उन अमर कृतियों में से है, जिसमें समाज का यथार्थ अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील रूप में सामने आता है। 1930 के दशक की पृष्ठभूमि में रचा गया यह उपन्यास दहेज, अविश्वास, सामाजिक मर्यादाओं, गलतफ़हमियों और परिस्थिति-जनित त्रासदियों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत करता है।
कहानी की नायिका निर्मला शांत, मितभाषी और सौम्य स्वभाव की लड़की है। विवाह से ठीक एक माह पूर्व उसके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो जाती है। इसी के साथ दहेज-लोलुप वर-पक्ष रिश्ता तोड़ देता है। विवश होकर उसकी मां, बिना दहेज के विवाह हो जाए, इस आशय से उसका विवाह चालीस वर्षीय विधुर मुंशी तोताराम से कर देती है, जिनके पहले विवाह से तीन पुत्र हैं—मंसाराम, जियाराम और सियाराम।
निर्मला तोताराम का आदर करती है और उनके बच्चों से स्नेह रखती है, किन्तु पिता के समान आयु वाले पति को स्वीकार करना उसके लिए भीतर ही भीतर पीड़ादायक था। किंतु उसने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया।
त्रासदी की शुरुआत वहाँ से होती है जहाँ मुंशी तोताराम के मन में निराधार शक घर करने लगता है। निर्मला और बड़े पुत्र मंसाराम की सामान्य बातचीत भी उन्हें खटकने लगती है। यह निराधार संदेह मंसाराम जैसे कोमल, संवेदनशील किशोर के लिए असहनीय सिद्ध होता है। अपमान और मानसिक दबाव से ग्रस्त मंसाराम धीरे-धीरे बीमार पड़ जाता है और केवल 16 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो जाती है।
मंसाराम की मृत्यु तोताराम के मानसिक संतुलन और आर्थिक स्थिति, दोनों को हिला देती है। मंझला बेटा जियाराम पिता को भाई की मौत का दोषी मानने लगता है। घर में अनादर, चोरी और बिगड़ती आदतें—परिवार की डोरें एक-एक कर टूटती चली जाती हैं।
सबसे छोटा बेटा सियाराम, तनाव और पारिवारिक अव्यवस्था से ग्रस्त होकर, साधु के बहकावे में आकर घर छोड़ देता है।
जियाराम, जो चोरी करते पकड़े जाने पर शर्मिंदगी और आत्मग्लानि से ग्रस्त था, अंततः आत्महत्या कर लेता है।
गहनों की चोरी और बेटों की दुखद घटनाओं के बाद निर्मला का मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। हर काम में संदेह, हर चीज़ में चिंता—उसका सौम्य स्वभाव अब कर्कशता और बेचैनी में बदल जाता है।
इन्हीं सब दुखों के बीच उसे एकमात्र सुकून मिलता है—डॉक्टर साहब की पत्नी सुधा से। सुधा का घर निर्मला के मन का आश्रय बन जाता है। किन्तु एक दिन, सुधा की अनुपस्थिति में डॉक्टर साहब की कही कोई अप्रत्याशित बात निर्मला को भीतर तक आहत कर देती है। अगले ही दिन डॉक्टर साहब द्वारा आत्महत्या इस घर की एक और त्रासदी बनकर सामने आती है। सुधा यह समझ जाती है कि अवसर पाकर मनुष्य का चरित्र भी डगमगा सकता है।
निर्मला इन सबका अपराध अपने सिर लेती रहती है—मंसाराम की बीमारी से मृत्यु, जियाराम की आत्महत्या, सियाराम का घर छोड़ जाना, तोताराम का टूटना, और सुधा के घर का उजड़ना। धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य गिरने लगता है। अंतिम दिनों में रूक्मिणी, जो कभी उसे पसंद नहीं करती थी, अब उसकी पीड़ा समझने लगती है।
निर्मला अपनी मृत्यु से पूर्व केवल एक प्रार्थना करती है—अपनी बेटी का पालन-पोषण करना, उसे अच्छी शिक्षा देना और योग्य वर से विवाह कराना।
दो दिनों के ज्वार के बाद निर्मला संसार को अलविदा कह देती है। लोग अग्निदान के विषय में सोच ही रहे होते हैं कि टूटा हुआ, थका हुआ मुंशी तोताराम संदूकची लिये लौटता है—परिवार की बिखरी हुई नींव का अंतिम प्रतीक।
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