सूरज चाचू

       
सूरज चाचू क्यों चमक रहे हो,
चमक - चमक कर तमक रहे हो,
क्या रुठे हो मां -पापा से,
क्या मुझसे कोई भूल हुई है,
या रुठे हो अम्मा से।
वर्षा भूआ जल्दी आओ,
अब ना देर लगाओ तुम।
सूरज चाचू रुठ गए हैं,
गुस्सा होकर उबल रहे हैं।
वर्षा भूआ मुझे बचाओ,
सूरज चाचू को मनाओ,
उनको बोलो, गुस्सा छोड़ें,
कहीं जल ही ना जाऊं मैं।
कंचन चौहान, बीकानेर 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रेत की मछली (पुस्तक समीक्षा)

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का प्रसिद्ध उपन्यास "बड़ी दीदी "

✨ It’s good to be confused at times... ✨