मत उलझो अब बन्नी सू

 

मत उलझो अब बन्नी सू

मत उलझो अब बन्नी सूं,

बन्नी अब पूरी है सक्षम है।

प्हलां तो कूख मांय मार गिराई,

अब ढूंढै सग्ला बीं बन्नी न।

बन्नी जन्मै बीं घर केवल,

जठै क़दर होवै है कन्या गी।

अब ना मार सहै बा बन्नी,

और ना ताना बा झेलैगी,

मत समझो बा पैर गी जूत्ती,

जियां राखोगा बा रहल्यगी।

मत उलझो अब बन्नी सूं,

बन्नी अब पूरी है सक्षम है।

पढ़ -लिख कर बा शिक्षित होगी,

शिक्षित होकर सक्षम होगी।

अब आत्म निर्भर बा बन्नी,

नहीं निर्भर बा औरां पर।

घर री बाग डोर बा सांभै

पापा रो दूजो कांधो है।

धणी र कदम सूं कदम मिलावै,

हर उलझन में साथ निभावै

पण अन्याय अब ना झेलैगी,

गलती पर बा आंख दिखावै,

ना समझो बा सह लैगी।

मत समझो बा पैर गी जूत्ती,

जियां राखोगा बा रहल्यगी।

बन्नी गो बस बो ही ठिकाणो,

जठै समझै सब घरगा बन्नी न।

प्रेम -प्यार सूं जान भी दे दै,

पण थे बोलोगा, बा बोलगी।

मत समझो बा पैर गी जूत्ती,

जियां राखोगा बा रहल्यगी।

कंचन चौहान, बीकानेर

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