दुःख के पंख
दुःख के पंख
✍️ रचना — कंचन चौहान
दुःख के पंख नहीं होते,
उन्हें पंख लगाने पड़ते हैं।
बिना पंख के दुःखों पर,
हमें पंख सजाने पड़ते हैं।
बने हौसले पंख दुःखों के,
ख्वाब सजाने पड़ते हैं।
आशाओं के पंख देकर,
हमें दुःख उड़ाने पड़ते हैं।
दुःख के पंख नहीं होते,
उन्हें पंख लगाने पड़ते हैं।
दुःखों को बस बोझ समझ कर,
दुःख से यदि दब जाओगे,
कोई नहीं आएगा आगे,
बस दुःख सहते रह जाओगे।
आशाओं के दीप जलाकर,
मेहनत का आकाश बनाकर,
साहस को तुम गले लगाकर,
देखो—खुद को आजमाकर,
खुद दुःख को पंख लग जाएंगे,
पंखों से अब सजे हुए दुःख,
दूर कहीं नभ में उड़ जाएंगे।
हाँ, दुःख के पंख नहीं होते,
फिर भी वे उड़ पाएंगे।
जब दिल में होंगे हौसले,
दुःख के पंख लग जाएंगे। 🌤️
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