रेत की मछली (पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक समीक्षा

रेत की मछली — कांता भारती

समीक्षक : कंचन चौहान

हाल ही में मैंने लेखिका कांता भारती की पुस्तक “रेत की मछली” पढ़ी, जो सरल भाषा में लिखी हुई एक प्रभावशाली और संवेदनशील कृति है। इस उपन्यास के तीन प्रमुख पात्र हैं — नायक शोभन, नायिका कुंतल, और उनके जीवन में आने वाली तीसरी स्त्री मीनल।

कहानी की शुरुआत में नायिका कुंतल को महिला हॉस्टल छोड़ने का आदेश मिलता है, क्योंकि वह न तो विधवा है और न ही अविवाहित — बल्कि एक “प्रत्यक्ता” है। हॉस्टल के नियमों के अनुसार उसे वहाँ रहने की अनुमति नहीं दी जाती।
कुंतल के मन में यह पीड़ा उठती है कि सत्य बोलने के कारण उसे दंड झेलना पड़ रहा है। यदि वह दूसरों की तरह झूठ का सहारा लेती, तो संस्था उसे स्वीकार कर लेती। किंतु आत्मसम्मान की रक्षा के लिए वह हॉस्टल छोड़कर अपनी सहेली के घर चली जाती है।

इसके बाद कथा अतीत की स्मृतियों में उतरती है। विवाह के बाद कुंतल ऐसे मोहल्ले में रहती है जहाँ एक युवक उसे अलग निगाहों से देखता है। परिणामस्वरूप उसके पति और सास को घर बेचकर वहाँ से जाना पड़ता है।
इन्हीं स्मृतियों में डूबी कुंतल अपने जीवन के उस कठिन क्षण को याद करती है जब उसे अपनी दो वर्ष की बच्ची तोरू को नायक शोभन को सौंपना पड़ा — जो एक माँ के लिए अत्यंत दुष्कर और पीड़ादायक अनुभव था।

कुंतल अपने जीवन के उन सुखद दिनों को भी स्मरण करती है जब वह साहित्यिक पत्रिका में समय व्यतीत करने के लिए कार्यरत थी।
उसी दौरान पत्रिका के संपादक आनंद जी ने उसकी मुलाकात शोभन से करवाई — जो देखने में आकर्षक और लेखन जगत का उभरता सितारा था।
आनंद जी की पत्नी ने दोनों के विवाह का निश्चय किया, यद्यपि कुंतल के पिता इस अंतरजातीय विवाह के पक्ष में नहीं थे। परंतु कुंतल के दृढ़ निश्चय के आगे उन्हें झुकना पड़ा और अंततः उसका विवाह शोभन से हो गया।

विवाह के प्रारंभिक दिन अत्यंत सुखद रहे। कुंतल को पति का प्रेम और सास का स्नेह भरपूर मिला। किंतु यह सुख अधिक समय तक स्थायी नहीं रहा। शोभन के जीवन में मीनल नामक एक अन्य स्त्री के आगमन ने सब कुछ बदल दिया।
यहीं से कुंतल के मानसिक और शारीरिक कष्टों की शुरुआत हुई। प्रसिद्ध लेखक होने के कारण शोभन सीधे उसे घर से नहीं निकाल सकता था, इसलिए उसने कुंतल पर चरित्रहीनता के आरोप लगाकर, उसे मानसिक रूप से तोड़ते हुए कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए।

अंततः कुंतल को अपनी दूधमुँही बच्ची के साथ घर छोड़ना पड़ा। दुख की बात यह रही कि उसकी सास — जो प्रारंभ में उसके प्रति स्नेहिल थीं — उन्होंने भी इन अत्याचारों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, जबकि शोभन पर उनका गहरा प्रभाव था।

कहानी के कुछ प्रसंग अस्पष्ट रह जाते हैं — जैसे मीनल का वास्तविक संबंध (कभी कुंतल की बहन, तो कभी शोभन को राखी बाँधने वाली बताई गई), या यह कि दो वर्ष बाद किन परिस्थितियों में नायिका को अपनी बच्ची पति को सौंपनी पड़ी।
फिर भी लेखिका ने कुंतल के मनोभावों, उसके संघर्ष और स्त्री-सम्मान की वेदना को अत्यंत गहराई और संवेदनशीलता से चित्रित किया है।

अंततः नायिका को “रेत की मछली” कहा गया है — ऐसी मछली जो रेत में तड़पती रहती है, सदैव प्यासी रहती है और जिसका कोई घर नहीं होता। यह प्रतीक नायिका के जीवन का अत्यंत सटीक रूपक बन जाता है।

कुल मिलाकर, “रेत की मछली” एक ऐसी कृति है जो पाठक को अंत तक बाँधे रखती है और समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी अस्मिता तथा आत्मसम्मान पर गहरी सोच छोड़ जाती है।

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