एक सवाल : आत्मा को छू लेने वाला प्रेम ❤️🌿 — अमृता प्रीतम
एक सवाल : आत्मा को छू लेने वाला प्रेम ❤️🌿
— अमृता प्रीतम
अमृता प्रीतम का उपन्यास एक सवाल प्रेम ❤️, पीड़ा 💔 और स्मृतियों 🌸 की गहन कथा है। यह केवल सामाजिक रिश्तों की कहानी नहीं, बल्कि आत्मा के स्तर पर जुड़े उस प्रेम की अभिव्यक्ति है जो समय ⏳, दूरी 🌍 और परिस्थितियों से परे रहता है।
कहानी की शुरुआत दस वर्षीय जगदीप से होती है, जो माँ की मृत्यु के बाद गहरे अकेलेपन में डूबा है। उसकी हमउम्र सहेली नूरां इस दुख में उसका संबल बनती है। पिता की दूसरी शादी के निर्णय के बाद मामा जगदीप को शहर ले जाते हैं, जहाँ वह पढ़ाई और कला में अपना भविष्य गढ़ता है।
गाँव छोड़ते समय जगदीप का सबसे बड़ा दुख उस बरगद के पेड़ 🌳 से जुड़ा है, जिसे उसने माँ के हाथ की बनी अंतिम दो रोटियों 🫓 के साथ नूरां के संग लगाया था—ताकि माँ की छाया 👩👦 हमेशा बनी रहे। जगदीप के जाने के बाद नूरां रोज़ उस पेड़ को पानी देती है 💧। बरगद उनकी यादों और निष्कलुष प्रेम का प्रतीक ❤️ बन जाता है।
शहर में जगदीप को पिता की दूसरी शादी का समाचार मिलता है। वह लंबे समय तक गाँव नहीं लौटता। मैट्रिक के बाद वह कमर्शियल आर्ट स्कूल में दाख़िला लेता है और चित्रकला में दक्ष हो जाता है।
एक दिन चाची के संदेश पर वह गाँव आता है। वहाँ वह देखता है कि आँगन में दीवार खड़ी है—एक ओर चाची, दूसरी ओर उसकी सौतेली माँ छोटी शाहणीं। छोटी शाहणीं बीस-बाईस वर्ष की, मासूम और भयभीत-सी है, पर जगदीप का पूरा ध्यान रखती है। जगदीप माँ की ट्रंक की चाबी उसे देता है। ट्रंक में माँ ने अपनी बहू के लिए सितारों वाली चुनरी और पाजेब रख छोड़ी थीं। जगदीप चुनरी और पाजेब अपने पास रखता है, बाकी सामान छोटी शाहणीं को दे देता है।
जगदीप नूरां से मिलता है 💭 और अनुरोध करता है कि क्या वह माँ की चुनरी पहनकर अपना चित्र बनवाएगी। नूरां शरमा जाती है और अगले दिन आने का वादा करती है। चौबारे में, सबकी नज़रों से बचकर, जगदीप नूरां का चित्र बनाता है और उसका नाम रखता है—“सपना”।
कुछ समय बाद बेगमां चाची (नूरां की माँ) नूरां की शादी की बात बताती हैं और विवाह का निमंत्रण देती हैं। जगदीप कुछ कह नहीं पाता और शहर लौट आता है। वह चित्र और सितारों वाली चुनरी संभालकर रखता है—यह जानते हुए कि उस समय उसका हाथ अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं था।
समय बीतता है ⏳। जगदीप एक प्रसिद्ध चित्रकार 🎨 बन जाता है। पिता के निधन पर वह गाँव लौटता है। छोटी शाहणीं पूरी तरह टूट चुकी है।वह जगदीप से कहती है कि अब जगदीप ही उसका एकमात्र सहारा है क्योंकि वह जगदीप को बताती है कि कैसे उसके मां-बाप ने मजबूर होकर उसे उसके पिता के हाथों बेच दिया था और बातों बातों में उसे जगत सिंह के बारे में पता चलता है। जगदीप उसे फिर से जीने की प्रेरणा देता है और अंततः उसका विवाह जगत सिंह से करवा देता है।
इसी बीच भारत–पाकिस्तान विभाजन 🇮🇳🇵🇰 होता है। अगली बार गाँव आने पर जगदीप को पता चलता है कि नूरां और उसकी माँ को गाँव छोड़ना पड़ा। उनका घर जला दिया गया और घर के पास का बरगद का पेड़ भी गिर गया। जाते समय नूरां कहती है कि उसे अपने जाने से अधिक बरगद के गिरने का दुख है।
बाद में जगदीप छोटी शाहणीं के गाँव जाता है। वह उसे देखकर बहुत प्रसन्न होती है, पर उसे यह समझ नहीं आता कि उसे किस रिश्ते से पुकारे। वह बताती है कि उसने अख़बार में जगदीप की तस्वीर संभालकर रखी है। दोनों के बीच गहरा स्नेह है। छोटी शाहणीं उसे अपने जीवन में खुशियाँ लौटाने के लिए धन्यवाद देती है और कहती है कि वह उसे “वीरां” कहकर बुलाए—क्योंकि वह उसे अपने छोटे भाई जैसा मानती है।
इसी दौरान जगदीप के जीवन में रेखा, एक प्रसिद्ध कवयित्री ✍️📖, आती है। रेखा शादीशुदा है, फिर भी दोनों एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जगदीप को रेखा के चेहरे में नूरां की झलक दिखाई देती है। वह सितारों वाली चुनरी के साथ नूरां और रेखा का संयुक्त चित्र बनाता है और कश्मीर की प्रकृति के बीच स्वयं को रेखा के साथ अनेक चित्रों में रचता है।
दिल्ली में उसकी भव्य प्रदर्शनी लगती है। रेखा सहेली के साथ आती है और चित्रों में स्वयं को पहचान लेती है। जगदीप को पता चलता है कि रेखा गंभीर रूप से बीमार है। बारिश में भीगने से जगदीप को बुख़ार हो जाता है, तो रेखा स्वयं उससे मिलने आती है। दोनों मन-ही-मन एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, पर रिश्तों की मर्यादा उन्हें बाँधे रखती है। रेखा आग्रह करती है कि क्या वह सितारों वाली चुनरी में उसका चित्र फिर बनाएगा। जगदीप वादा करता है—उसके ठीक होने पर।
लेकिन रेखा की मृत्यु हो जाती है 🕊️💔। जगदीप वह चुनरी रेखा की सहेली को दे देता है। सहेली रेखा के पति से कहती है कि रेखा की अंतिम इच्छा थी कि विदाई के समय वही चुनरी उसके साथ हो और रेखा को चुनरी ओढ़ा देती है।
रेखा को सितारों वाली चुनरी में देखकर जगदीप को सुकून मिलता है। रेखा की सहेली जगदीप को एक छोटा-सा काग़ज़ देती है, जो
रेखा ने रात को जगदीप के लिए लिखा था:
> “सूरज देवता द्वार पर आ गया,
किसी किरण ने उठकर स्वागत न किया।
हमारी मोहब्बत ने एक सवाल किया,
किसी भगवान से जवाब न बन पड़ा।”
क्षण भर को समय ठिठक जाता है—जैसे वह भी उस सवाल का उत्तर खोज रहा हो 🤍। फिर सिर झुकाकर आगे बढ़ जाता है, मानो इस प्रेम-सवाल का कोई उत्तर उसके पास भी न हो।
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