बाल मजदूर

      बाल मजदूर 
छोटे-छोटे कंधे हैं , कितने बोझ से दबे हुए,
हौसले बुलंद हैं इनके, चेहरे इनके खिले हुए।
अपना पालन खुद करने का सुकून आंखों में लिए,
परिवार के लिए ही जीना है, ये जज्बा दिल में लिए,
घर से निकले हैं ये बाल - मजदूर, मजदूरी के लिए,
ठेला,होटल, फैक्ट्री या फिर घरों में झाड़ू पोंछा,
हर काम खुशी से करते हैं, कुछ पैसों की प्यास लिए ,
हर काम में मन है लगाते, थोड़ी तारीफ की आस लिए ,
मालिक के बच्चों को निहारें ऐसे,
दूसरी दुनिया के बच्चे हों जैसे।
काम बड़ों का करते हैं फिर भी,
बाल - मजदूर ये कहलाते हैं ।
छोटी सी गलती पर भी ये बालक
डांट और मार भी खाते हैं।
आंखों के आंसू ये पी जाते,
चेहरे पर खिली मुस्कान लिए ।
छोटे-छोटे नाजुक कंधों पर ये,
बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी उठाए हैं,
खुद के सपने मार कर भी ये,
छोटे-छोटे सपने सजाए हुए मन में।
भाई के लिए टाॅफी,बहन के लिए खिलौना,
मां के लिए साड़ी और बापू के लिए चप्पल,
ये सब कुछ इनको लेना है, 
अगली पगार के मिलने पर ।
यही चर्चा साथी मजदूरों से करते,
मन में छोटी सी आस लिए।
कितनी मेहनत ये करते हैं, 
आंखों में गजब की प्यास लिए।
घर से निकले हैं ये बाल - मजदूर, मजदूरी के लिए।
छोटे-छोटे कंधों पर अपनें,घर की सौ मजबूरी लिए।
कंचन चौहान, बीकानेर 



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