संदेश

जून, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दान : करुणा और विवेक का संतुलन

दान भारतीय संस्कृति के सबसे पवित्र कार्यों में से एक माना गया है। किंतु दान का वास्तविक महत्व केवल देने में नहीं, बल्कि देने की भावना में निहित है। जब हम किसी वस्तु, धन या संसाधन का दान करते हैं, तब हमारे मन में उसके प्रति मोह, आसक्ति या स्वामित्व का भाव नहीं होना चाहिए। न ही यह अपेक्षा होनी चाहिए कि इसके बदले हमें पुण्य प्राप्त होगा, समाज में सम्मान मिलेगा या लोग हमारी प्रशंसा करेंगे। सच्चा दान वही है जो निःस्वार्थ भाव से किया जाए, जिसमें देने वाला अपने अहंकार को भी त्याग दे। लेकिन केवल निःस्वार्थ भावना ही पर्याप्त नहीं है। दान के साथ विवेक का होना भी उतना ही आवश्यक है। यह देखना चाहिए कि जिसे हम दान दे रहे हैं, वह वास्तव में सहायता का पात्र है या नहीं। हमारी दी हुई सहायता का उपयोग किस उद्देश्य के लिए होगा, इसका भी यथासंभव विचार करना चाहिए। यदि हमारी सद्भावना से दिया गया धन किसी गलत कार्य में प्रयुक्त हो जाए, तो दान का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। इसलिए दान करते समय भावुकता के साथ-साथ समझदारी भी आवश्यक है। सच्चा दान वह है जो किसी की आवश्यकता को पूरा करे, उसके जीवन में सुधार लाए और उस...

हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं

हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं कभी-कभी हम सोचते हैं— "मुझे यह करना चाहिए था", "मैंने यह किया", "मैं यह करूँगा" । इन विचारों के बीच कहीं न कहीं यह भावना भी छिपी होती है कि हम ही सब कुछ करने वाले हैं। लेकिन जीवन के अनेक अनुभव हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। रामायण का एक प्रसिद्ध प्रसंग है। जब रावण सीता माता को मारने के लिए आगे बढ़ा, तब हनुमान जी के मन में विचार आया कि उन्हें माता की रक्षा के लिए कुछ करना चाहिए। पर उसी समय मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। तब हनुमान जी को अनुभव हुआ कि प्रभु जिस कार्य को जिससे करवाना चाहते हैं, वही उससे करवाते हैं। हम तो केवल माध्यम हैं। इसी प्रकार त्रिजटा ने स्वप्न देखा कि एक वानर पूरी लंका को जला देगा। हनुमान जी ने सोचा कि प्रभु ने तो उन्हें ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि स्वयं रावण ने उनकी पूँछ में आग लगवाकर अपनी ही लंका के विनाश का मार्ग तैयार कर दिया। तब हनुमान जी को यह विश्वास हो गया कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। जिस कार्य को जिससे करवाना होता है, ...