हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं
हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं कभी-कभी हम सोचते हैं— "मुझे यह करना चाहिए था", "मैंने यह किया", "मैं यह करूँगा" । इन विचारों के बीच कहीं न कहीं यह भावना भी छिपी होती है कि हम ही सब कुछ करने वाले हैं। लेकिन जीवन के अनेक अनुभव हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। रामायण का एक प्रसिद्ध प्रसंग है। जब रावण सीता माता को मारने के लिए आगे बढ़ा, तब हनुमान जी के मन में विचार आया कि उन्हें माता की रक्षा के लिए कुछ करना चाहिए। पर उसी समय मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। तब हनुमान जी को अनुभव हुआ कि प्रभु जिस कार्य को जिससे करवाना चाहते हैं, वही उससे करवाते हैं। हम तो केवल माध्यम हैं। इसी प्रकार त्रिजटा ने स्वप्न देखा कि एक वानर पूरी लंका को जला देगा। हनुमान जी ने सोचा कि प्रभु ने तो उन्हें ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि स्वयं रावण ने उनकी पूँछ में आग लगवाकर अपनी ही लंका के विनाश का मार्ग तैयार कर दिया। तब हनुमान जी को यह विश्वास हो गया कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। जिस कार्य को जिससे करवाना होता है, ...