हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं
हम केवल निमित्त हैं, पर कर्म हमारे ही हैं
कभी-कभी हम सोचते हैं—"मुझे यह करना चाहिए था", "मैंने यह किया", "मैं यह करूँगा"। इन विचारों के बीच कहीं न कहीं यह भावना भी छिपी होती है कि हम ही सब कुछ करने वाले हैं। लेकिन जीवन के अनेक अनुभव हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है।
रामायण का एक प्रसिद्ध प्रसंग है। जब रावण सीता माता को मारने के लिए आगे बढ़ा, तब हनुमान जी के मन में विचार आया कि उन्हें माता की रक्षा के लिए कुछ करना चाहिए। पर उसी समय मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। तब हनुमान जी को अनुभव हुआ कि प्रभु जिस कार्य को जिससे करवाना चाहते हैं, वही उससे करवाते हैं। हम तो केवल माध्यम हैं।
इसी प्रकार त्रिजटा ने स्वप्न देखा कि एक वानर पूरी लंका को जला देगा। हनुमान जी ने सोचा कि प्रभु ने तो उन्हें ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि स्वयं रावण ने उनकी पूँछ में आग लगवाकर अपनी ही लंका के विनाश का मार्ग तैयार कर दिया। तब हनुमान जी को यह विश्वास हो गया कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। जिस कार्य को जिससे करवाना होता है, वह उसी को उसका निमित्त बना देते हैं।
लेकिन यदि हम केवल यहीं रुक जाएँ, तो एक प्रश्न उठता है। यदि सब कुछ ईश्वर ही करवा रहे हैं, तो फिर मनुष्य के कर्मों का क्या महत्व है? फिर कोई दुर्योधन क्यों बनता है और कोई अर्जुन क्यों?
भगवद्गीता इसी प्रश्न का उत्तर देती है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य के भीतर स्थित चेतना ही उसे सही और गलत का बोध कराती है। दुर्योधन धर्म और अधर्म का अंतर जानता था, फिर भी उसने अपने अहंकार और स्वार्थ का साथ चुना। दुशासन ने अपने विवेक का उपयोग नहीं किया और अंधानुकरण का मार्ग अपनाया। दोनों के भीतर आत्मा तो वही थी, पर उनकी चेतना और उनके चुनाव अलग थे।
यहीं गीता का गहरा संदेश सामने आता है। मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता मिली है, लेकिन परिणाम उसके हाथ में नहीं हैं। हम निमित्त अवश्य हैं, पर अपने कर्मों की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हैं। इसलिए कर्म को ही प्रधान माना गया है।
कुछ दिन पहले मैंने एक विचार सुना जिसने मुझे इस सत्य को और गहराई से समझाया। एक नर्स से पूछा गया कि उनके काम की सबसे बड़ी कठिनाई क्या है। उन्होंने उत्तर दिया कि कभी-कभी डॉक्टरों का व्यवहार उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाता है।
तब उनसे पूछा गया, "क्या मरीजों का व्यवहार आपको दुख नहीं देता? वे भी तो कई बार गुस्सा करते हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं और अनुचित व्यवहार कर बैठते हैं।"
नर्स ने कहा, "नहीं, क्योंकि हम जानते हैं कि मरीज बीमार है। उसका दर्द और उसकी परेशानी उसके व्यवहार को प्रभावित कर रही है। इसलिए हम उसके व्यवहार को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेते।"
उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई। मैंने सोचा कि यदि हम एक बीमार व्यक्ति के कठोर व्यवहार के पीछे उसकी पीड़ा को देख सकते हैं, तो जीवन में मिलने वाले अन्य लोगों के व्यवहार को भी उसी दृष्टि से क्यों नहीं देख सकते?
जो व्यक्ति दूसरों को दुख पहुँचाता है, वह भी कहीं न कहीं भीतर से दुखी, अशांत या टूटा हुआ हो सकता है। जो स्वयं भीतर से संतुलित और प्रसन्न होता है, वह सामान्यतः दूसरों को पीड़ा नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं कि हम गलत व्यवहार को उचित ठहराएँ, बल्कि यह कि हम केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय समझने का प्रयास करें।
शायद यही जागृत चेतना का लक्षण है। जब हम दूसरों के व्यवहार के पीछे छिपी पीड़ा को देखना सीख जाते हैं, तब हमारे भीतर का क्रोध कुछ कम हो जाता है और करुणा का जन्म होने लगता है।
रामायण हमें सिखाती है कि हम कर्ता होने का अहंकार न करें। गीता हमें सिखाती है कि हम अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करें। और जीवन के अनुभव हमें सिखाते हैं कि दूसरों को समझने के लिए केवल उनकी बातों को नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक अवस्था को भी देखना आवश्यक है।
अंततः जीवन का सार शायद यही है कि हम स्वयं को ईश्वर का निमित्त मानते हुए श्रेष्ठ कर्म करें, अपनी चेतना को जागृत रखें और दूसरों के प्रति करुणा का भाव बनाए रखें। क्योंकि कर्म हमारे हाथ में हैं, अहंकार नहीं; और समझ हमारी शक्ति है, प्रतिक्रिया नहीं।
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