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माटी रा मटका

  माटी रा मटका आज घरां सूं गायब होग्या माटी रा मटका, सौंधी सी खुशबू थी बां की, पानी अमृत सो। मटके री जगहां आ गी बोतल, जी गो जंजाल बनी, ना प्यास मिटै, ना तृप्ति हुवै,बस सारै दिन भटकां। खाली पड़ी ए बोतलां,म्हे भर भर गै थक ग्या, आज घरां सूं गायब हो ग्या पाणी रा मटका। शीतल जल बां मटकां रो, जो मन शीतल कर जाय, बर्फिलो जल आं बोतलां रो , भभकी सी लग जाय। कित्ता फायदा बां मटकां रा, कौण किनै समझाय, पढ्यां- लिख्यां री दुनिया है आ,सिर मैं पड्यां ही मति आय। सेहत सूं खिलवाड़ करै अर फैर पीछै पछताए, हांडी, कुल्हड़ पाछा आग्या,अब मटका लेयो मंगाय। सौंधी सी खुशबू है बां की, पाणी अमृत सो, शीतल जल बां मटकां रो,मन शीतल होय जाय।   कंचन चौहान , बीकानेर

कुछ सीखो चिड़िया रानी से

      कुछ सीखो चिड़िया रानी से   सुबह सुबह जब चिड़िया रानी चूं चूं, चीं चीं करती है, मीठी प्यारी बोली उसकी, सबमें नयी ऊर्जा भरती है। चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर दाना-पानी चुगती है, नन्ही सी ये प्यारी चिड़िया मेहनत करना सिखलाती है। खुद ये दाना चुगती और बच्चों को अपने खिलाती है। नन्ही सी ये प्यारी चिड़िया हमें क्या क्या पाठ पढ़ाती है, सुबह -सवेरे जल्दी उठकर काम पर अपने जाती है। बच्चों को ये पाल पोस कर इतना उन्हें सिखाती है, खुद ही पालन करें वो अपना, ये उनको बतलाती है। उड़ना जब वो सीख हैं जाते,तो स्वतंत्र उन्हें बनाती है, मोह माया में नहीं जकड़ती,आजाद उन्हें वो करती है, कितना सुन्दर मन है उसका, कुछ सीखो चिड़िया रानी से। हे मानव तूं कितना उलझा, जीवन की मोह माया में, तेरे बच्चे हर पल देखें, मुंह तेरी धन - माया का। हे मानव तूं क्यूं ना सीखे , नन्ही प्यारी चिड़िया से, बच्चों को बनाओ आत्मनिर्भर,मत जकड़ो जंजीरों से, खुद पर अपने करो भरोसा,आस रखो बस ईश्वर से। मीठी प्यारी बोली बोलो,नव ऊर्जा का संचार करो, अच्छे कर्म करो इस जग में और भ...

मत उलझो अब बन्नी सू

  मत उलझो अब बन्नी सू ं मत उलझो अब बन्नी सूं , बन्नी अब पूरी है सक्षम है। प्हलां तो कूख मांय मार गिराई, अब ढूंढै सग्ला बीं बन्नी न। बन्नी जन्मै बीं घर केवल, जठै क़दर होवै है कन्या गी। अब ना मार सहै बा बन्नी, और ना ताना बा झेलैगी, मत समझो बा पैर गी जूत्ती, जियां राखोगा बा रहल्यगी। मत उलझो अब बन्नी सूं, बन्नी अब पूरी है सक्षम है। पढ़ -लिख कर बा शिक्षित होगी, शिक्षित होकर सक्षम होगी। अब आत्म निर्भर बा बन्नी, नहीं निर्भर बा औरां पर। घर री बाग डोर बा सांभै पापा रो दूजो कांधो है। धणी र कदम सूं कदम मिलावै, हर उलझन में साथ निभावै पण अन्याय अब ना झेलैगी, गलती पर बा आंख दिखावै, ना समझो बा सह लैगी। मत समझो बा पैर गी जूत्ती, जियां राखोगा बा रहल्यगी। बन्नी गो बस बो ही ठिकाणो, जठै समझै सब घरगा बन्नी न। प्रेम -प्यार सूं जान भी दे दै, पण थे बोलोगा , बा बोल ै गी। मत समझो बा पैर गी जूत्ती, जियां राखोगा बा रहल्यगी। कंचन चौहान, बीकानेर

बारिश

       बारिश काले -काले बादल आए, संग अपने है बारिश लाए। बारिश की वो बूंद सुहानी, जब मिट्टी को गले लगातीं हैं , मिट्टी से मिल कर वो बूंदे , धरा पर सौंधी खुशबू फैलाती ं है ं । काले बादल उमड़ - घुमड़ कर, धरती पर अपना प्यार लुटाते हैं , बारिश की फिर बूंदें बन वो , वसुधा को गले लगाते हैं। ब ूंदें फिर बौछारें बन कर, धरती की प्यास बुझात ीं हैं । बारिश की वो सुहावनी बूंदें, सब पर   रंग दिखलाती हैं , मौसम तब बदले धरा पर , नया रंग चढ़ जाता सब पर, हरियाली   छाए वसुधा पर, मन की कलियां खिल जातीं हैं। वृक्षों का हर पत्ता - पता, बारिश में धुल जाता है। बारिश के पानी में नहा कर, सब बच्चे,बूढ़े और जवान, जीवन का आनन्द उठाते हैं। बारिश के पानी में कुछ पल, हर ग़म को भूल वो जातें हैं, बारिश का पानी सावन में, सबके मन को लुभाता है, क्यों कि ये वो बारिश है, जो कृषकों के मन भाती है। गर्मी से राहत मिलती सब को, और धरा हरी-भरी हो जाती है।   कंचन चौहान, बीकानेर

कथा मेरे दौर की

  कथा मेरे दौर की यह कथा मेरे ही दौर की है, नहीं व्यथा ये किसी और की है। नहीं सुनते बच्चे बड़ों की अब, लगता है इ नको भाषण सब। ठोकर लगती फिर रोते हैं, और अपना आपा खोते हैं । है गुस्सा इनमें भरा हुआ, नहीं धैर्य इनमें जरा सा है। नाजुक मन है कोमल इनका, पल भर में टूट ये जाते हैं, लेकिन ना अहसास जताते हैं, गुस्से को हथियार बनाते हैं, और बदतमीज कहलाते हैं। झांको, जरा इनके अन्तर्मन में, कितने मासूम ये बच्चे हैं। बस कमी जरा सी इतनी हैं, ना रिश्ते – नाते पहचाने ये , एक मोबाइल को अपना मानें य े , व्यवहारिक ज्ञान ना जाने ये, ना सही और ग़लत पहचाने ये, गूगल का ज्ञान ही माने ये, ना व्यवहारिकता को जाने ये, ये बच्चे मेरे ही दौर के हैं, नहीं बच्चे ये किसी और के है। पर कितना प्यार जताऊं मैं, और कैसे इनको बतलाऊं मैं, मेरी जिम्मेदारी है कितनी, ये कैसे इनको समझाऊं मैं। ये कथा नहीं किसी और की है, ये व्यथा मेरे ही दौर की है। कंचन चौहान, बीकानेर

पापा की परी

   पापा की परी पापा मुझको पंख मिले हैं, मुझको अंबर में उड़ना है, उड़ने की आजादी दे दो, मुझे अपना क्षितिज बढ़ाना है। ऊंची से ऊंची मैं उड़ पाऊं, अपना आकाश बनाऊं मैं। बस मुझको एक मौका दे दो, पापा की परी कहलाऊं मैं। बिन अनुमति मैं कुछ नहीं करती, पापा से हर बात मनवाऊं मैं। ना-ना करते, फिर हां भरते, पापा हर ज़िद पूरी करते, पापा की मैं लाडली बेटी, पापा की परी कहलाऊं मैं। पापा मुझको पंख मिले हैं, मुझको अंबर में उड़ने दो, पढ़ने की मुझे अनुमति दे दो, आत्मनिर्भर बन जाऊं मैं। उच्च शिक्षा का मौका दे दो, मुझको बस ये तोहफा दे दो, इक नया इतिहास बनाऊं मैं , अपने सुंदर पंख फहरा कर, ऊंचे अंबर में उड़ जाऊं मैं । दुनिया को नतमस्तक कर दूं, पापा का मान बढ़ाऊं मैं। बस पापा मेरे खुश हो जाएं, अब ऐसा कुछ कर जाऊं मैं, पापा की हूं लाडली बेटी पापा की परी कहलाऊं मैं। कंचन चौहान, बीकानेर